रविवार, 13 जून 2010

एक मासूम सफ़र भाग -१


आज भी नहीं भुलता उस पल को जब मैं अपने गॉव को, अपने जन्मस्थल को छोड़कर अपने दादाजी, अंकल और अंटी के साथ साथ रायपुर के लिये रवाना होता था. उस समय मै केवल सात वर्ष का था और तबियत खराब रहने के कारण अपने दादाजी अंकल और अंटी के साथ रायपुर के पास गरियाबंद मे रहता था, वहां दादाजी एक व्याख्याता थे और अंकल एक अध्यापक. गॉव मे मेरी मम्मी, दादीजी और मेरे दो छोटे भाई रहते थे और डैडी कर्नाटक मे रहते थे. दिल उस समय कॉप जाता था जब मम्मी कहती थी कि चलो राजा तैयार हो जाओ जीप आने वाली है युं तो जब भी नये कपड़े पहनने का मौका मिलता था उस समय मेरी खुशी का ठीकाना नहीं रहता था, नये कपड़े पहन कर बहोत इतराता था.
परन्तु आज ये नये कपड़े मन को जरा भी नहीं भा रहे थे इनकी चमक आज मेरी आँखो में धुंधली थी. युं तो जब कभी भी मौकों पर पूड़ी सब्जी बनती थी, मै खाने मे जरा भी पिछे नही रहता था, घर के लोग कहते राजा तेरी जीभ बहोत लम्बी है, पर आज एक पूड़ी सब्जी खाना मन के लिये भरी पड़ रहा था, ऐसा लग रहा था कि मै अब रो दून्गा. फिर भी अभी तक आन्सू दबे हुए थे. लेकीन जैसे ही जीप के हॉर्न की आवज सुनाई देती गला भर आता था, लेकिन ऑसुओं की बुंदे अब भी कहीं छुपी हुई थी. मेरे भाई और गॉव के बच्चे उस जीप के पीछे दौड़ते थे, और थोड़ी दूर के लिये उसमे बैठ कर खुश हो जाते थे लेकीन आज मुझे वो खुशी नही मिल रही थी जब मै भी इनके साथ जीप के पीछे दौड़ता था पर भले ही मै पिछे रह जाता था और सब मुझे चिढ़ाते थे. वक्त जाने का आ जाता था मै अपनी मम्मी का पाव छुता तो मम्मी की आँखो में आसू दीखाई पड़ते थे. मम्मी घर की डेवढी तक ही छोड़ने आती थी. दादीजी हाथों मे जल का लोटा लेकर जीप के पास तक आती थी और जीप के आगे उसे ढोल देती थी, इसके बाद मै दादीजी के पाव छुता तो वो भी रोती हुई दिखाई देती थी. इसके बाद मै जीप मे बैठता और जैसे ही जीप स्टार्ट होती थी कि मेरी आँखो से आसूओं की धारा निकल पड़ती थी. जीप आगे जाती थी पर मेरी नजरे घर के पीछे लगी रहती थी, जहाँ बाग मे मेरी दादी और मेरे भाई के साथ गॉव के कुछ लोग दीखाई देते थे और घर कि छत पर मेरि मम्मी के टाटा करते हुए हाथ. मै ना जाने क्यु हाथ हिलाकर उन्हे टाटा नही कर पाता था. मै पिछे की तरफ़ तब तक देखता जब तक की मेरा घर मेरी आँखो से ओझल नही हो जाता था. मेरी ये सुरत देख कर मेरी अंटी मुझे चुप कराती थी. आधे एक घन्टे मे हम लोहिंदा चौराहा पर पहुंच जाते थे जहॉ से हमे इलाहाबाद के लिये बस मिलती थी. जीप वाला अपना किराया लेकर लौट जाता था, मेरी निगाहें उस जीप को ओझल होने तक देखती रहती थी, ये जानकर कि वो जीप मेरे गॉव की है. जब बस के हॉर्न की अवाज सुन एक बार फ़िर मेरा दिल भर आता थ मेरे दादाजी बड़े प्यार से मेरे सर पर हाथ रखकर पुछते क्य हुआ राजा, मै उन्हे कोइ जवब नही देता. बस मे बैठने के बाद मेरी आँखो उस दिशा को खोजती जिधर मेरा घर था. इलाहाबाद रेलवे स्टेशन तक पहुंचते-पहुंचते मेरे आंसू खत्म हो चुके होते थे..................................................क्रमश:

3 टिप्‍पणियां:

  1. मन को छू गया यह संस्मरण .
    बहुत अच्छे से लिखा है.
    अपने जन्मस्थान से ,अपने घर से लगाव कभी खतम नहीं होता .
    छुटपन में घर से दूर जाना पड़े तो मन दुखी होता ही है.
    अगली कड़ी की प्रतीक्षा रहेगी.

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  2. nice yaar tu writer ban sakta hai

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  3. बहुत मर्मस्पर्शी..घर से बाहर जाने पर मन दुखी होता ही है ,,सुन्दर प्रस्तुति..शुभ कामनायें

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