अब मै अपनी कुछ पंक्तियों को यहाँ आकार देना चाहूँगा-
’एक आश’ - a hope never end
जीवन के सफर में चल रहे थेअन्जानों के बीच से गुजर रहे थे
दूर तलक ना दिखता कोई अपना ये तो बन गया जैसे कोई सपना
राह की बहार लगती थी पराई साथ मे थी तो सिर्फ मेरी तन्हाई
पत्थर से दिल तोड़ने वालो की ना थी कमी किसी को कहाँ दिखती मेरी आँखों की नमी
हम तो बस चलते ही जा रहे थे राहों मे पड़े कांटे स्वागत कर रहे थे
आँखों मे गहरा समंदर था पवों मे बस छाले ही छाले
धुप भरी जिंदगी थी हमारी छांव ने भी किये थे किनारे
पर आखिर क्या करे हम
हमें तो आखिर चलना ही था
अचानक राह में एक मोड़ अनोखा आया हमे दिखे चार प्यारे अजनबी अंजाने
चारो को देखकर राहत की साँस पायी जन्मों पुरानी दोस्ती शायद यहीं पायी
मिले थे चारो तो अजनबी की तरह पर ना जाने कब हो गये दिल के अपने
पाँच दोस्तों का मिलन हुआ इस राह पर
चल पड़े राह में साथ दोस्ती निभानें
जरा वक्त की नजाकत तो देखरुठी हुई किस्मत मेरे सामने आयी
जिस राह पर चल रहे थे हम
उस पर हरियाली ही हरियाली छायी
राह में खिल गये थे फूल सुहाने
बेवक्त बसंत आ गयी हमारे सामने
पाँचो दोस्तो की दोस्ती देख वक्त भी लगा मुस्कुराने जिंदगी के गम आपस मे लगे थे बाटने
दर्द जिंदगी के लगे थे हम भुलाने
एक दुसरे की खुशी ही थी अपनी वक्त भी लगा था मरहम लगाने
अब इस राह पर चलना लग रहा था सपना
जन्मों जन्म के बाद जैसे मिला हमे कोई अपना
करने लगे थे वादे,खाने लगे थे कसमे खुद की जां से भी ज्यादा प्यारे हो गये ये अपने
दोस्तों ने ही पहचान करायी दोस्ती से
हमें मिलवाया जिंदगी की खुशियों से
दोस्ती की ताकत ने असर अपना दिखाया जिन शब्दो को हम केवल सोचते थे उसे स्याही की धार से बहाया कोरे कागज को हमने शब्दों से सजाया
पर समय का पहिया फिर से घुमा
आये ऐसे स्थान पर जहाँ पाँच राह थे
वक्त आ गया था सबसे जुदा होकर जाने का
इस रिश्ते को सहेजकर नया रिश्ता निभाना था
पाँचों की अलग-अलग मंजिले इंतजार कर रही थी हर आँखे आगे ना जाने का इजहार कर रही थी
पर वक्त के आगे तो झुकना पड़ता है
मजबुरन इक राह को चुनना पड़ता है
पॉव तो आगे बढ़ ही ना राहे थे
पर बेरहम वक्त उसे धकेल रहे थे
उकेर रहे थे दोस्ती के लम्हों को दिल मे
एक आश बना रहे थे अपने दिल मे
मेरा दिल कह रहा था बार-बार ऐसे दोस्त नहीं मिलते आशीष हर बार
रोक ले इन्हे ना हो जाये कहीं देरी
मौका ऐसा ना फिर आयेगा कभी
आँसुओं की धाराऒं को रोक रखा था मैने
दिल जो कह रहा था नही कह सकता था जमाने के सामने
मैने अपने नादान दिल को समझाया
उसे दोस्तों का खुशनुमा भविष्य बताया
त्याग भी दोस्ती की ही एक पहचान है
दोस्तों की खुशी मे ही हमारी जान है

पाँचो राह आगे बढे जा रहे थे मेरी आँखों से ओझल होते जा रहे थे
अब तो मेरी ही राह थी मेरे सामने
मेरे कदमों के पीछे आंसुओं की धार है
चला था अकेला इस राह पर
अब यादों की ढेर मेरे साथ है
इस आशीष के मन मे फिर भी
उन दोस्तों को पाने की एक आश है
दोस्तों मै नही जानता कि मैने जो रचना लिखी है वो किस विधा के अंतर्गत आयेगी, पर मैने जो लिखा है वो मन से अपने दोस्तों के लिये लिखा है. आश यही है कि आपको यह पसंद आयी होगी. किसी भी प्रकार की गलती के लिये क्षमाप्रार्थी हूँ . वैसे भी ये इस प्रकार की मेरी पहली रचना है
आशीष मिश्रा 9893200206
धन्यवाद
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