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शुक्रवार, 26 नवंबर 2010

***ममता***

Romantic Moon  Heart Cloud  Purple morning  Moon
हर सुबह
पौ फटते ही
एक लाठी के सहारे
सफेद साड़ी से लिपटी
दुर्बल काया लिये
वह आ जाती 
प्रौढ आश्रम के दरवाजे पर
पथराई आँखों से  
इंतजार करती वो
दूर तक फैले पथ पे
किसी के आने की,
अपनों से बेगाना होकर
अपनों से ही आश रखती थी
खामोश रहकर भी
अनगिनत सवाल करती थी 
सोचती कभी तो आयेगा
वो मेरा लाल 
जो मेरा दुलारा है
जो मेरा प्यारा है 
राह देखते देखते
कई सांझ ढल गयी थी
रातें भी ना जाने कितनी
उस सुबह की याद में 
निकल गयी थी
ऊंगली पकड़कर 
आज वो उस अपने के
साथ चलाना चाहती थी
जिसे कभी वो
चलना सिखाती थी
जिंदगी आखिरी पड़ाव पे थी
उस पल में वो कुछ
आपनों का साथ चाहती थी
एक सुबह 
नई किरणें जब बिखर रही थी
वो आज एक कोनें मे पड़ी 
खामोश थी
उसकी लाठी 
जो सहारा देती थी उसे
बेसहारा सी पड़ी थी
जिस राह को 
वो रोज तकती थी
आज उस पर  मोतियों की तरह
चारों ओर बिखरी सी 
ममता की ओस पड़ी थी..................

रविवार, 14 नवंबर 2010

बाल दिवस विशेष.........अंजाना पथ नन्हे कदमों का

हर सुबह
पथरीले राहों पर
नंगे पाँव
एक नन्हा कदम
जो कोमल नहीं है
वक्त ने जिसे पत्थर कर दिया 
निकलता है
ढूँढने अपना सुरज
एक रोशनी को पाने 
जो उसकी भुख
शांत कर सके
वह खोजता है दिन भर
अपने हिस्से की रोटी
कभी आग में तपकर
कभी पत्थरों को उठाकर
कभी हाथों में 
बंडल लिये अखबारों का
वह घुमता है उन चौराहों पे
जहाँ जिंदगी 
घिरी रहती है, मौत के पहियों से
वह घुमता है उन गलियों में
जहाँ रहते हैं
समाज के ठेकेदार
उनकी नजरें क्रुरता भरी
घुरकर भगाती हैं उसे
वह हर चेहरे की तरफ 
देखता है कुछ आश लेकर
पर दुत्कार सहता हुआ
लफ्जों को बंद रखकर
आगे चलता जाता है
उस रास्ते पर
जहाँ उसकी जिंदगी 
दिखती है बोझों तले 
ना डॉक्टर, ना इंजीनियर
ना वकील के ख्वाब
उसका तो ख्वाब
रह जाता है
बस भुख मिटाने के लिये
ये दुनिया चूर है
अपनी दुनिया में
वह नहीं देख पाती
एक दूसरी दुनिया
जो अंजान है
ना जाने कितनी खुशियों से
स्कूलों की चारदिवारी से
जब निकलते हैं
नव वसन में
कांधे पे बैग
हाथों मे बॉटल लिये
मुस्कुराते फूल
उसका मन
लालच भरी नजरों से
झुक जाता है
हाथों मे लिये 
फावड़े को देखकर
शाम ढलते ही लौटता है
उस आशियाने की तरफ
जो खुद उसका नहीं
कुछ युं ही
दौड़ रहा है वो
अंजाने पथ पर...........

आशीष मिश्रा 

चित्र गूगल सर्च से साभार

बुधवार, 10 नवंबर 2010

हर चिट्ठा कुछ कहता है

हर चिट्ठा कुछ कहता है

कभी खामोश लफ्जों में
दर्द को खुद में समेटे हुए
वक्त के दिये जख्मों को उकेरता है
बनकर शब्दों की माला
हर चिट्ठा कुछ कहता है





बीते लम्हों को संजोकर
सुनहरे पलों की याद लिये
अपनी कहानी कहता है
बनकर शब्दों की माला
हर चिट्ठा कुछ कहता है





कभी शून्य आवाज में
कभी चीर आवाज में
मन को झकझोर देता है
बनकर शब्दों की माला
हर चिट्ठा कुछ कहता है





कभी मासूम आवाज में
तुतलाती आवाज में
एक बचपन कुछ कहता है
कभी गंभीर आवाज में
बनकर एक नव चिराग
जिंदगी का सच बताता है
बनकर शब्दों की माला
हर चिट्ठा कुछ कहता है

Peace


एक पहेली बनकर
पहेली बनी जिंदगी को
खुदब खुद सुलझाता है
सुझबूझ की बाते बताकर
बनकर शब्दों की माला
हर चिट्ठा कुछ कहता है



उम्र की दहलीज पे
बनकर बचपन की आवाज
खुद को एक मासुम बनकर देखता है
इस जिंदगी के मेले में
बनकर शब्दों की माला
हर चिट्ठा कुछ कहता है



अंधेरी राह पर
ठोकरों को भी सहता है
पर दुसरों के लिये नवदीप बनकर
वह पथ पर चलता है
बनकर शब्दों की माला
हर चिट्ठा कुछ कहता है
blue book


तोड़ कर बाधाएँ सीमाओं की
सागर की गहराई को भी नापता है
जोड़कर परायों को आपस में
यह अपना नया परिवार बनाता है
बनकर शब्दों की माला
          हर चिट्ठा कुछ कहता है............  





                                                                                                                                                                                         

बुधवार, 3 नवंबर 2010

तुम क्यों चली आती हो



तुम क्यों चली आती हो

"मॉ तुम मुझे २ रुपये क्यों नही दे देती वो देखो राजु बहोत ढेर सारे पटाखे फोड़ रहा है, मुझे ललचा भी रहा है......मॉ चलो एक रुपये ही दे दो मै टिकरी ही ले लुंगा" एक मासुम आवाज जिसके चेहरे की चमक सुरज की रोशनी से कम नहीं थी लेकिन उसके चिथड़े कपड़े उसकी अलग ही कहानी कह रहे थे.
"नहीं बेटा ! मेरे पास अब पैसे नहीं हैं, चल तु हाथ धो ले , देख मैने तेरे लिये पुड़ी और खीर बनायी है......"
"नहीं पहले मुझे एक रुपये दो वरना मैं कुछ नहीं खाउंगा, तुमने पिछली साल भी मुझे एक्को रुपये नहीं दी थी......." सिसकीयों की आवाजे इस झोपड़े मे फैल रही थी.
"बेटा प्रकाश तु तो इस घर की हालत देख ही रहा है हमारे पास कुछ भी नहीं है, बड़े ही मुश्किल से ५० रुपये मिलें हैं उसी से इस त्योहार के लिये तैयारी की है.............अब तु ही बता कहाँ से दूँ तुझे एक रुपये.......देख तु जब बड़ा होकर कमाने लगना तब ढेर सारे पटाखे फोड़ना , चल हाथ धोकर खाना खा ले फिर मै तुझे मिठाई भी खिलाऊँगी  "
"मै नहीं खाऊँगा...... तुम्ही खाओ" यह कह कर वह वही पास में रखे टुटे खाट पर सो गया, जब मासुम मन रोता है तब भी उसमें एक नयी आश रहती है. वह मन में सोचता है कि जब बड़ा हो जाऊँगा तो ढेर सारे पटाखे फोड़ुंगा और उस राजु को एक भी नहीं दुंगा. मैं भी नये-नये कपड़े पहनुंगा तब देखना....
और इधर आंसुओं की इन धाराओं के बीच प्रकाश के इस त्योहार पर भी मन का प्रकाश बुझा हुआ था.
तुम हर बार आती हों,
कुछ खुशियाँ देने के बदले,
रुलाकर चली जाती हो,
तु ही तो सब कुछ है,
तेरा स्वागत कैसे करूँ,
आखिर तुम क्यों चली आती हो.........
इस छोटे से घर के बाहर हर तरफ  उजाले ही उजाले थे, ये बड़े भवन वाले किसी के स्वागत में कोई कमी नहीं रखना चाहते थे.
और इस टुते फुटे घर में भला आये ही कौन.................
Orkut Scraps

रविवार, 1 अगस्त 2010

एक आश- तुम्हारी दोस्ती का

                                       HAPPY FRIENDSHIP DAY
आप सभी लोगों को मेरा नमस्कार आज एक ऐसा दिवस है जो जिसका इंतजार सभी दोस्तों को रहता जिसे आंग्ल भाषा मे कहा जाता है- freindship day. लेकिन आज के समय मे दोस्ती शब्द कई लोगों के लिये या तो टाइमपास है या फिर अपना स्वार्थ पुरा करने के लिये दूसरो का उपयोग करना. आज के दोस्त कहने को तो कह देते है "यार हम तो तेरे लिये जान भी दे सकते है" लेकिन जब उससे एक छोटी सी मदद मांगो तो कहता है "अरे यार! कसम से मै तेरा काम कर देता पर मै आज बहोत बिजी हूँ." आज जरुरत इस बात की है कि हम दोस्ती के पवित्र रिश्ते को समझे, दोस्ती में सिर्फ कस्में नही खाये जाते बल्की जीवन के हर मोड़ पर दोस्त के सुख-दुख मे साथ निभाना पड़ता है. 

       वैसे हो सकता है मै दोस्ती को अच्छी तरह से परिभाषित ना कर सकूँ. एक लेकिन दोस्ती को परिभाषित करते हुए मै इतना ही कहना चाहुँगा कि 
"दोस्ती विश्वास और स्नेह से बना एक ऐसा प्यारा बंधन है जो कभी नही टूटती है".
Happy Friendship Day



अब मै अपनी कुछ पंक्तियों को यहाँ आकार देना चाहूँगा-
      ’एक आश’ - a hope never end    

जीवन के सफर में चल रहे थे
अन्जानों के बीच से गुजर रहे थे

दूर तलक ना दिखता कोई अपना
ये तो बन गया जैसे कोई सपना

राह की बहार लगती थी पराई
साथ मे थी तो सिर्फ मेरी तन्हाई
पत्थर से दिल तोड़ने वालो की ना थी कमी
किसी को कहाँ दिखती मेरी आँखों की नमी

हम तो बस चलते ही जा रहे थे
राहों मे पड़े कांटे स्वागत कर रहे थे

आँखों मे गहरा समंदर था
पवों मे बस छाले ही छाले
धुप भरी जिंदगी थी हमारी
छांव ने भी किये थे किनारे

पर आखिर क्या करे हम
हमें तो आखिर चलना ही था



अचानक राह में एक मोड़ अनोखा आया
हमे दिखे चार प्यारे अजनबी अंजाने

चारो को देखकर राहत की साँस  पायी
जन्मों पुरानी दोस्ती शायद यहीं पायी

मिले थे चारो तो अजनबी की तरह
पर ना जाने कब हो गये दिल के अपने

पाँच दोस्तों का मिलन हुआ इस राह पर
चल पड़े राह में साथ दोस्ती निभानें

जरा वक्त की नजाकत तो देख
रुठी हुई किस्मत मेरे सामने आयी

जिस राह पर चल रहे थे हम
उस पर हरियाली ही हरियाली छायी

राह में खिल गये थे फूल सुहाने
बेवक्त बसंत आ गयी हमारे सामने


पाँचो दोस्तो की दोस्ती देख वक्त भी लगा मुस्कुराने
जिंदगी के गम आपस मे लगे थे बाटने


दर्द जिंदगी के लगे थे हम भुलाने
एक दुसरे की खुशी ही थी अपनी
वक्त भी लगा था मरहम लगाने 

अब इस राह पर चलना लग रहा था सपना
जन्मों जन्म के बाद जैसे मिला हमे कोई अपना


करने लगे थे वादे,खाने लगे थे कसमे
खुद की जां से भी ज्यादा प्यारे हो गये ये अपने

दोस्तों ने ही पहचान करायी दोस्ती से
हमें मिलवाया जिंदगी की खुशियों से


दोस्ती की ताकत ने असर अपना दिखाया
जिन शब्दो को हम केवल सोचते थे
उसे स्याही की धार से बहाया
कोरे कागज को हमने शब्दों से सजाया

पर समय का पहिया फिर से घुमा
आये ऐसे स्थान पर जहाँ पाँच राह थे

वक्त आ गया था सबसे जुदा होकर जाने का
इस रिश्ते को सहेजकर नया रिश्ता निभाना था


पाँचों की अलग-अलग मंजिले इंतजार कर रही थी
हर आँखे आगे ना जाने का इजहार कर रही थी

पर वक्त के आगे तो झुकना पड़ता है
मजबुरन इक राह को चुनना पड़ता है

पॉव तो आगे बढ़ ही ना राहे थे
पर बेरहम वक्त उसे धकेल रहे थे

उकेर रहे थे दोस्ती के लम्हों को दिल मे
एक आश बना रहे थे अपने दिल मे
मेरा दिल कह रहा था बार-बार
ऐसे दोस्त नहीं मिलते आशीष हर बार

रोक ले इन्हे ना हो जाये कहीं देरी
मौका ऐसा ना फिर आयेगा कभी

आँसुओं की धाराऒं को रोक रखा था मैने
दिल जो कह रहा था नही कह सकता था जमाने के सामने

मैने अपने नादान दिल को समझाया
उसे दोस्तों का खुशनुमा भविष्य बताया

त्याग भी दोस्ती की ही एक पहचान है
दोस्तों की खुशी मे ही हमारी जान है





पाँचो राह आगे बढे जा रहे थे
मेरी आँखों से ओझल होते जा रहे थे

अब तो मेरी ही राह थी मेरे सामने
मेरे कदमों के पीछे आंसुओं की धार है

चला था अकेला इस राह पर
अब यादों की ढेर मेरे साथ है

इस आशीष के मन मे फिर भी
उन दोस्तों को पाने की एक आश है

    

दोस्तों मै नही जानता कि मैने जो रचना लिखी है वो किस विधा के अंतर्गत आयेगी, पर मैने जो लिखा है वो  मन से अपने दोस्तों के लिये   लिखा है. आश यही है कि आपको यह पसंद आयी होगी. किसी भी प्रकार की गलती के लिये क्षमाप्रार्थी हूँ . वैसे भी ये इस प्रकार की मेरी पहली रचना है


आशीष मिश्रा
9893200206 


धन्यवाद

                                
                                                                                   
                 

सोमवार, 14 जून 2010

एक मासूम सफ़र भाग -२



इलाहाबाद के रेलवे स्टेशन पर पहुँच कर वहॉ की रौनकता देखकर ना जाने क्यों मेरा मन थोड़ा सा खुश हो जाता था, शायद प्लेटफ़ॉर्म पर रेलगाड़ीयों को देखने के लिये क्योकि उन्हे देखना बहोत अच्छा लगता था या फ़िर कुछ अच्छा खाने को मिलेगा यह सोचकर. आखिर बचपना था कुछ अच्छा खाने को मिले तो भला मन क्यो ना खुश हो और वह भी तब जब काफ़ी रो लिया हो. प्लेटफ़ार्म पर पहुँच मेरे अंकल तुरंत कुछ खाने का प्रबंध करते थे, कोल्डड्रींक की बाटल मिल जाने पर मेरी खुशी थोड़ी और बढ जाती थी, बड़े ही इस्टाईल से पीता था जैसे आजकल के हीरो विज्ञापनो मे पीते है. स्टेशन के प्लेटफ़ॉर्म पर बस कुछ ऐसी आवाजे सुनाई देती- "यात्रीगण कृपया ध्यान दे छपरा से चलकर दुर्ग को जाने वाली गाड़ी संख्या ५१५९ सारनाथ एक्सप्रेस अपने निर्धारीत समय पर प्लेटफ़ॉर्म नम्बर ५ पर आ रही है". मेरे दादाजी मेरी तरफ़ देखते और कहते राजा तुम्हारी ट्रेन आ रही है. मन मे फ़िर ना जाने क्यो गॉव की याद छा जाती थी. जैसे ही रेलगाड़ी व्हीस्टल देते हुये प्लेटफ़ॉर्म पर प्रवेश करती, उसकी आगे की हेड लाइट दिखाई देती, उसकी धड़-धड़ की आवज सुनाई देती तो अभी थोड़ी देर पहले ट्रेनो को देखने पर जो खुशी मिल रही थी वह गायब हो गयी. अब तो ऐसा लग रहा थे जैसे कोई मुझे मेरे गॉव से जुदा करने आ रहा है. इन्जन जब मेरे सामने से गुजरा तो मै डर जाता, मेरी आन्खो मे सिर्फ़ गांव की यादे सामने आ रही थी. मेरी अंटी मेरा हाथ पकड़ लेती और मै उनके साथ अपने कोच की ओर बढ़ने लगता. काफ़ी भीड़ रहती थी, लोगो मे कहा सुनी हो जाती थी, हमारे सामने वाले बर्थ पर एक काफ़ी बुजुर्ग व्यक्ति बैठे हुए थे तभी एक सज्जन वहां आये जो काफ़ी गुस्से मे थे, उन्होने हमारे सामने बैठे बुजुर्ग व्यक्ति से कहा कि ये बर्थ उनकी है, वो वहां से उठ जाये. इस पर बुजुर्ग व्यक्ति ने कहा कि मै अगले स्टॉप पर उठ जाउन्गा और कुछ दिनो बाद तो दुनिया से ही उठ जाउन्गा. इस बात को सुनकर सज्जन व्यक्ति चुप हो गये. उनकी बाते मुझे उस समय समझ नही आयी थी , पर अब जब मै थोड़ा समझदार हो गया हुं तो वो बाते मुझे समझ मे आ गयी है, यही सोचता हूँ कि व्यक्ति बर्थ के लिये क्यो लड़ता है, ये आज तुम्हारी है कल और किसी की हो जायेगी. भगवान श्री कृष्ण द्वारा गीता मे कही गयी बाते यहा भी सिद्ध होती है. 
                                     गाड़ी व्हीस्टल देती और चुपके से प्लेट्फ़ॉर्म को छोड़ने लगती तब मुझे लगता कि अब तो अपना देश छुट गया, मै हमेशा खिड़की के पास ही बैठता था, धीरे-धीरे गाड़ी अपनी रफ़्तार पकड़ लेती इलाहाबाद का दृश्य दिखाई देने लगता और थोड़ी देर मे यमुना नदी आ जाती, यमुना पुल को पार कर गाड़ी नैनी स्टेशन पर आ कर रुकती. इसके बाद गाड़ी अपनी पूरी रफ़्तार के साथ आगे बढ़ने लगती. रायपुर से घर आते वक्त चेहरा घर पहुँचने की खुशी मे खिला रहता था मै दादाजी और अंटी से ढेरो प्रश्न पुछता था कि यमुना नदी कब आयेगी, घर हम कितने बजे तक पहुँच जायेंगे, बब्बा ये ट्रेन धीमे क्यो चल रही है, इस ट्रेन को कौन बनाता है आदि. पर आज यह बड़-बड़ बोलने वाली मेरी जबान पुरी तरह बन्द थी. आज इस जबान से एक शब्द बोलना भारी पड़ रहा था. मेरी निगाहें खिड़की से बाहर की ओर देख रही थी , किसी दूर के पेड़ को देखकर लगता जैसे वो मेरे घर के सामने वाला पेड़ है. मेरी निगाहें उन्हे ढुंढने की कोशीश करती जो मेरे गांव का हो पर यहा तो सब अन्जान लोग ही दिख रहे थे. मेरी रोनी सी सुरत देखकर मेरे बब्बा(दादाजी) जी मुझसे पुछते कि क्या हुआ राजा मम्मी की याद आ रही है क्या ? इतना सुनना था कि मै फ़फ़क-फ़फ़क के रो पड़ता तब मेरी आंटी मुझे चुप कराती और कहती कि राजा जब दीपावली पर बब्बा आयेन्गे तब तुम भी उनके साथ आ जाना . मेरे इस दुखी मन को थोड़ी राहत मिल जाती पर हचकोले बन्द ही नही होते थे. धीरे-धीरे रात होने लगती बहर बल्बो की रोशनी दिखाई देने लगती थी पर आज मेरी ये निगाहें गॉव के लालटेन की रोशनी को देखना चाहती थी. गॉव मे बिजली आ जाने पर हम सब बहोत खुश हो जाते थे. पर आज रास्ते और ट्रेन मे लगी ये बल्बे मुझे अन्जानी सी लग रही थी. आज तो मुझे लालटेन की रोशनी चाहिये थी. वक्त खाना खाने का होता तो गॉव से लाई हुइ पुड़ी सब्जी को देख कर मन खुश हो जाता क्योकि इसे मेरी दादी और मम्मी ने बनाया था मैं इन्हे बड़े ही चाव से खा लेता और एक त्रिप्ती का अनुभव होता था, उस समय यदि कोई मेरे सामने मिठाई क डिब्बा भी रख देता तो शायद मै उसकी तरफ़ देखना भी पसन्द ना करता. खाना खाने के बाद मेरे अंकल मुझे उपर की बर्थ पर भेज देते थे. थोड़ी देर मे आँख लग जाने के बाद तो मै वापस अपने गॉव पहुँच जाता था मन एक बार फ़िर खुशी से दमकने लगता मुझे मेरा खोया हुअ सब कुछ मिल जात था, पर जब सुबह आँख खुलती तो खुद को गॉव कि खटीये के बजाय ट्रेन की बर्थ पर पाता. शाम तक गाड़ी रायपुर पहुँच जाती. ट्रेन से उतरने के बाद के मेरा मन जिसे इलाहाबाद मे कोस रहा था उसी ट्रेन को मै गेट से बाहर होने तक बार बार पलट कर देख रहा था. शायद मेरी ये आँखे उससे कह रही हो...................
ऐ दोस्त लौट के जब मेरे देश जाना
       कह देना मेरे उस सरजमीम को 
तेरी याद अब भी मेरे साथ है
        मै तेरी यादो को भुला नही हूँ



दोस्तो ये मेरी पहली रचना थी. इसमे जो गलती हुइ हो उसके लिये मुझे माफ़ करना. ये एक बचपन की सच्ची दास्ता थी

रविवार, 13 जून 2010

एक मासूम सफ़र भाग -१


आज भी नहीं भुलता उस पल को जब मैं अपने गॉव को, अपने जन्मस्थल को छोड़कर अपने दादाजी, अंकल और अंटी के साथ साथ रायपुर के लिये रवाना होता था. उस समय मै केवल सात वर्ष का था और तबियत खराब रहने के कारण अपने दादाजी अंकल और अंटी के साथ रायपुर के पास गरियाबंद मे रहता था, वहां दादाजी एक व्याख्याता थे और अंकल एक अध्यापक. गॉव मे मेरी मम्मी, दादीजी और मेरे दो छोटे भाई रहते थे और डैडी कर्नाटक मे रहते थे. दिल उस समय कॉप जाता था जब मम्मी कहती थी कि चलो राजा तैयार हो जाओ जीप आने वाली है युं तो जब भी नये कपड़े पहनने का मौका मिलता था उस समय मेरी खुशी का ठीकाना नहीं रहता था, नये कपड़े पहन कर बहोत इतराता था.
परन्तु आज ये नये कपड़े मन को जरा भी नहीं भा रहे थे इनकी चमक आज मेरी आँखो में धुंधली थी. युं तो जब कभी भी मौकों पर पूड़ी सब्जी बनती थी, मै खाने मे जरा भी पिछे नही रहता था, घर के लोग कहते राजा तेरी जीभ बहोत लम्बी है, पर आज एक पूड़ी सब्जी खाना मन के लिये भरी पड़ रहा था, ऐसा लग रहा था कि मै अब रो दून्गा. फिर भी अभी तक आन्सू दबे हुए थे. लेकीन जैसे ही जीप के हॉर्न की आवज सुनाई देती गला भर आता था, लेकिन ऑसुओं की बुंदे अब भी कहीं छुपी हुई थी. मेरे भाई और गॉव के बच्चे उस जीप के पीछे दौड़ते थे, और थोड़ी दूर के लिये उसमे बैठ कर खुश हो जाते थे लेकीन आज मुझे वो खुशी नही मिल रही थी जब मै भी इनके साथ जीप के पीछे दौड़ता था पर भले ही मै पिछे रह जाता था और सब मुझे चिढ़ाते थे. वक्त जाने का आ जाता था मै अपनी मम्मी का पाव छुता तो मम्मी की आँखो में आसू दीखाई पड़ते थे. मम्मी घर की डेवढी तक ही छोड़ने आती थी. दादीजी हाथों मे जल का लोटा लेकर जीप के पास तक आती थी और जीप के आगे उसे ढोल देती थी, इसके बाद मै दादीजी के पाव छुता तो वो भी रोती हुई दिखाई देती थी. इसके बाद मै जीप मे बैठता और जैसे ही जीप स्टार्ट होती थी कि मेरी आँखो से आसूओं की धारा निकल पड़ती थी. जीप आगे जाती थी पर मेरी नजरे घर के पीछे लगी रहती थी, जहाँ बाग मे मेरी दादी और मेरे भाई के साथ गॉव के कुछ लोग दीखाई देते थे और घर कि छत पर मेरि मम्मी के टाटा करते हुए हाथ. मै ना जाने क्यु हाथ हिलाकर उन्हे टाटा नही कर पाता था. मै पिछे की तरफ़ तब तक देखता जब तक की मेरा घर मेरी आँखो से ओझल नही हो जाता था. मेरी ये सुरत देख कर मेरी अंटी मुझे चुप कराती थी. आधे एक घन्टे मे हम लोहिंदा चौराहा पर पहुंच जाते थे जहॉ से हमे इलाहाबाद के लिये बस मिलती थी. जीप वाला अपना किराया लेकर लौट जाता था, मेरी निगाहें उस जीप को ओझल होने तक देखती रहती थी, ये जानकर कि वो जीप मेरे गॉव की है. जब बस के हॉर्न की अवाज सुन एक बार फ़िर मेरा दिल भर आता थ मेरे दादाजी बड़े प्यार से मेरे सर पर हाथ रखकर पुछते क्य हुआ राजा, मै उन्हे कोइ जवब नही देता. बस मे बैठने के बाद मेरी आँखो उस दिशा को खोजती जिधर मेरा घर था. इलाहाबाद रेलवे स्टेशन तक पहुंचते-पहुंचते मेरे आंसू खत्म हो चुके होते थे..................................................क्रमश: