पथरीले राहों पर
नंगे पाँव
एक नन्हा कदम
जो कोमल नहीं है
वक्त ने जिसे पत्थर कर दिया
निकलता है
ढूँढने अपना सुरज
एक रोशनी को पाने
जो उसकी भुख
शांत कर सके
वह खोजता है दिन भर
अपने हिस्से की रोटी
कभी आग में तपकर
कभी पत्थरों को उठाकर
कभी हाथों में
बंडल लिये अखबारों का
वह घुमता है उन चौराहों पे
जहाँ जिंदगी
घिरी रहती है, मौत के पहियों से
वह घुमता है उन गलियों में
जहाँ रहते हैं
समाज के ठेकेदार
उनकी नजरें क्रुरता भरी
घुरकर भगाती हैं उसे
वह हर चेहरे की तरफ
देखता है कुछ आश लेकर
पर दुत्कार सहता हुआ
लफ्जों को बंद रखकर
उस रास्ते पर
जहाँ उसकी जिंदगी
दिखती है बोझों तले
ना डॉक्टर, ना इंजीनियर
ना वकील के ख्वाब
उसका तो ख्वाब
रह जाता है
बस भुख मिटाने के लिये
ये दुनिया चूर है
अपनी दुनिया में
वह नहीं देख पाती
एक दूसरी दुनिया
जो अंजान है
ना जाने कितनी खुशियों से
स्कूलों की चारदिवारी से
जब निकलते हैं
नव वसन में
कांधे पे बैग
हाथों मे बॉटल लिये
मुस्कुराते फूल
उसका मन
लालच भरी नजरों से
हाथों मे लिये
फावड़े को देखकर
शाम ढलते ही लौटता है
उस आशियाने की तरफ
जो खुद उसका नहीं
कुछ युं ही
दौड़ रहा है वो
अंजाने पथ पर...........
आशीष मिश्रा
चित्र गूगल सर्च से साभार





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